Sunday, July 27, 2008

आतंकवाद

Hi all,
It is very sad that so many terror activities are going there in our country. Is there no means to counteract these activities.


चारो तरफ है फैला आतंक का जाल,
कैसे कोई रखे अपने आप को सम्हाल,
ये मनुष्य है प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ जीव,
अब तक जो नही पाया मिलजुलकर रहना सीख,
आज के समय का है ये यथार्थ,
मनुष्य से लिपटा हुआ है स्वार्थ,
आज मानव किस प्रगति की राह पे जा रहा,
मनुष्य को मनुष्य ही है यहाँ खा रहा,
जब तक मनुष्य अपने स्वार्थ और घृणा को नही जाएगा भूल,
तब तक आतंकवाद का चुभता रहेगा ये दर्दनाक शूल,
आओ हम सब मिल कर आतंकवाद की जड़े काटे,
आओ हम सब अपना सुख दुःख आपस में बाटें

------------***--------------
ललित कुमार पटेल २८/०७/08

Thursday, July 24, 2008

सावन

It is raining out there. I am sitting in my office looking outside through window. I wish I would have been playing amid this rain shower.


आया सावन,
सबका मन भावन,
चारो ओर है फैली हरियाली,
झूम रहा हर पत्ता पत्ता , डाली डाली,
देखो नाच रहा है मोर,
दादुर मचा रहे है शोर,
बादल चाचा जाग गए,
सूरज दादा भाग गए,
धीमे धीमे है पड़ रही फुहार,
चहू ओर फैली खुशियाँ अपार।
------------------ललित कुमार पटेल २५/०७/08

Tuesday, July 22, 2008

Phone Problem

Yesterday night I saw that my phone SMS memory is almost full.This inspire me to write this poem(or whatever you like to call it). Altough it it is merely a Tukbandi but I found it was quite tricky to find appropiate words. So enjoy ....

तुम्हारे प्यार की आहट पाकर मेरा सब कुछ हिल गया,
फ़ोन ही नही दिल का भी रिंगटोन बदल गया,
दिमाग का inbox और outbox सब भर गया,
फ़ोन का बिल देखकर ये दिल डर गया,
अब तो ये फ़ोन धीरे धीरे vibrate होने लगा,
दिल भी बिना कुछ कहे ही librate होने लगा,
दिमाग की हालत जैसे पाक मे परवेज हो गया,
तुम्हारा फ़ोन जब से out of कवरेज हो गया,
मैंने कहा या खुदा अब बस कर ज़ुल्मो सितम,
message आया तुम्हारी validity है अब खतम,

----------------------------ललित कुमार पटेल २३/०८/०८

Thursday, July 17, 2008

मजाक करना मजाक नही

Hi all,

Yesterday there was a lecture on topic "मजाक करना मजाक नही " in our BARC. Here I have written few lines in this context.

मजाक करना आसान नही होता,
होठो पे हँसी है तो क्या हुआ ,
दिल अपने दर्द से अनजान नही होता,
मिल गए होते गर तुम पहले,
दिल दर्द से यू बेजान नही होता,
इन्शानियत न बचती इस जहाँ में कहीं पर ,
गर इंसान पल भर का यहाँ मेहमान नही होता,
दूसरो को मुस्कराते देख खुशी होती है इस दिल को,
वरना किसी के मुस्कराने से किसी पे एहसान नही होता,
बाँटता गर हर कोई अपनी थोडी सी खुशी,
दुनिया में फिर कोई दर्द से परेशान नही होता।


-------------------ललित कुमार पटेल १७/०७/08

Wednesday, July 9, 2008

अपनी बात

Hi all,

Back again. May be you have heard it somewhere.But I have written it to express my own feelings.

न कोई शिकवा आपसे न कोई गिला रहे ,
आरजू है बस इतनी कि एक सिलसिला रहे,
दोस्ती की जो सौगात जो अपने दी है वो नही है कम ,
फिर भी दिल की है तमन्ना अब न कोई फासला रहे,
दूरिया हो कितनी हमारे दरमिया नही कोई ग़म ,
बस आपसे मिलने की दिल में हौसला रहे,
मुश्किलें जिंदगी की मिलजुल कर सह लेगे हम,
फक्त जरूरत है कि हमारा दिल मिला रहे।

--------------------ललित कुमार पटेल १०/०७/०८

Sunday, July 6, 2008

सुषमा के लिए

Hi
This post is for Sushma only . Anyone else please read it at your own risk.
This is not written by me.
मिलेगे अहबाब से तुफैल की बदीद से तर जाऊँगा,
उम्र की कैद से छूटूगा तो घर जाऊँगा,
जिन्दगी बीत गई तेरी महफिल में पर ये समझ ना आया,
तेरी महफिल से ऊँठूगा तो किधर जाऊँगा,
जाने क्यो इस बात का दिल को यकीन है मेरे ,
एक नजर तेरी पड़ी तो सँवर जाऊँगा,
तश्गनी धूप की शिद्त की गर हद से आगे बढ़ी ,
तेरी आँखों की समंदर में उतर जाँऊगा.
---------- writer तुफैल
------------ ललित पटेल

साथ

Hi all,
Yesterday night Vineet wished me to have a good night and told me to write a poem in my dream.

विनीत कहता है तुम रात में लिखो ,
अपने समय की हर बात पे लिखो ,
भीग जाए तन मन जिसकी बारिस में ,
ऐसी हर खुशी की बरसात पे लिखो,
तोड़ दे जो पुरानी रूढ़ियो को ,
हर उस ज़हीन पाक हाथ पे लिखो,
करीब लाये जो लोगो के दिलो को,
हर उस मुकम्मल साथ पे लिखो ,
रह गई जो दबकर भीड़ में,
ऐसी हर अनसुनी फरियाद पे लिखो.
----------------ललित कुमार पटेल ०७/०७/2008

Thursday, July 3, 2008

महंगाई

प्लेटो में पड़े समोसो को देखकर
मैंने दुकानदार से पूछा,
साहब, आपका समोसा है कच्चा,
साइज़ में लगता है ये समोसे का बच्चा,
दुकानदार गरमाया,
अपनी बढ़ी हुई तोंद को और फुलाया,
क्या समझा है मुझे टुच्चा,
जो मिल रहा है वो लेलो बच्चा,
ये मेरा नही महंगाई की है करामात,
जिससे ख़राब है सबके हालात,
अब तो मुझे हो रहा है ये आभास ,
वो दिन दूर नही जब खाना नही उसकी फोटो देखकर मिटानी पड़ेगी भूख प्यास,
मैंने छोड़ी अपनी रोकी हुई साँस,
समोसो को देखा लगाकर आस,
सोचा हो महंगाई का सत्यानास।

---------------------ललित कुमार पटेल ०३/०७/०८

Wednesday, July 2, 2008

अकेला

Hi all,
This is not written by me but I had heard it from somewhere.

भीड़ में रहता हूँ सुनसान के सहारे ,
जैसे कोई मन्दिर हो गाँव के किनारे,
मिलने को मिलता रहा जमाना ,
पर कोई ऐसा नही मिला जो प्यार से पुकारे।
-------lalit kumar patel 3/07/08

भगवान् से

बसे हुए तुम कण कण मे फिर मै ढंढू तुम्हे कहाँ ,
भरके हाथो को प्रेम पुष्प से अध्यॅ दे सकूँ तुम्हे ज़हाँ
--------- lalit Kumar patel 2/07/08