Hi all, back again. Here is one of my poem. I don't know why it came into my mind.
हूँ मै स्तंभित ,
ह्रदय है व्यथित,
किया मुझे विचलित,
भंग हुआ भीतर का मौन,
अजनबी तुम हो कौन,
तुम आए हो क्या करने ?
धर माया रूप मुझको छलने ?
मेरे ह्रदय को मुझसे हरने,
या फिर जीवन में कुछ रंग भरने,
संग अपने न जाने क्या लाये हो ?
प्रेम सुधा ज्यों भर लाये हो ,
तो फिर स्वीकार है मुझे तुम्हारा आमन्त्रण,
क्या तुम्हे भी स्वीकार है मेरा समर्पण ?
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------------------------ललित कुमार पटेल ११/०८/०८
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