Hi
Back again. As I am going to be married soon.
Here is one of my poem in memory of my childhood.
याद है सब कुछ ,
वो मम्मी का सुबह को जल्दी उठाना,
वो जल्दी जल्दी में चीजो का हाथ से गिराना,
वो स्लेटो से आपस में मारा मारी करना,
वो नहाये न होने पर टीचर से मार खाने से डरना,
वो कलम के लीए नरकट के पेडो को तोड़ना,
वो गेद के लीए एक एक पैसे जोड़ना ,
वो स्याही और दवात के बदले चीजो का बदलना,
वो पचीस पैसे में लेमनचूस खरीदना,
वो दस रुपये होने पर अपने आप को अमीर समझना,
वो अमरद और आवला की चोरी करना,
वो इमली के लिए आपस में लड़ना,
वो पेड़ पर उचाई तक चड़ना,
वो दोस्तों के साथ कंचे , लुका छिपी और गुल्ली डंडा खेलना,
वो खेल में एक दूसरे को हराना,
वो मम्मी का भूतो से डराना,
वो गलती करने पर जाकर चुपचाप पढ़ने लगना,
वो गर्मी की छुट्टियों में दोपहर को घर से भागना,
वो रात में picture के लीये जागना,
वो घर से बचकर T.V. देखना ,
वो जब प्यार से सब 'लल्लू' बुलाते थे ,
वो जब किसी के घर बे रोकटोक जा सकते थे,
अभी कल ही की बात तो लगती है,
कुछ छूट गया ऐसा जान पड़ती है,
कहाँ गया वो मेरा बचपन ,
कहाँ गया वो मेरा छुटपन,
कहाँ गया वो ज़माने का प्यार,
वो लोगो का अपनापन ,
अब जिन्दगी में नही कुछ विशेष है,
बस यादें ही शेष है।
-------ललित कुमार पटेल 28-06-08
1 comment:
Your poem(bachpan ki....)is very nice.It turn me in my memory of childhood.
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